"पोषण"
"जिस प्रकार से किसी भी बालक/बालिका के अच्छे व्यक्तित्व के निर्माण के लिए माता-पिता के द्वारा सन्तुलित रूप से प्रदान किया जाने वाला प्रेम,वात्सल्य,ज्ञान व सौरक्षण अत्यंत आवश्यक होता है।
ठीक उसी प्रकार से एक साधक/साधिका की 'चेतना' रूपी बच्चे के विकास
व आंतरिक सन्तुलन के लिए "माता" के रूप में 'मध्य हृदय की ऊर्जा' व "पिता"
के रूप में 'सहस्त्रार की ऊर्जा' बराबर मात्रा में आवश्यक
होती है।
यानि किसी भी साधक/साधिका को अपने मध्य हृदय व सहस्त्रार की ऊर्जा को निरंतर
आत्मसात करते हुए।
गहन आत्मचिंतन के द्वारा सजगता पूर्वक अपनी समस्त पूर्व कंडीशनिंग (संस्कारो)
का त्याग करते हुए अपनी चेतना को इन संस्कारों से मुक्त करते रहना चाहिए।
पूर्व संस्कार बासी भोजन की तरह होते हैं जो हमारी चेतना को विभिन्न प्रकार के
रोगों से ग्रस्त कर हमें अधोगति की ओर धकेलते रहते हैं।
आत्मपरिष्करण में हर पल संलग्न रहते हुए इसी 'ध्यानस्थ अवस्था' में बने रहते हुए ही
अपने दैनिक जीवन के कार्यो को सम्पन्न करते रहना चाहिए ताकि नए संस्कार(कंडीशनिंग)
भी हमारी चेतना में पनप न पाए।
साथ ही हमें अपने भीतर में नवीनता से आच्छादित उल्लास अनुभव करते हुए अपने हर
क्षण को सार्थक करते रहना चाहिए।
ऐसा करते रहने से हमारी चेतना नकारात्मक विचारों के चंगुल में कभी भी फंस नहीं
पाएगी जो सदा पूर्व संस्कारों की ही देन होते हैं।
इन संस्कारों के कारण उत्पन्न होने वाले विचार हमारी चेतना का लगातार शोषण करते रहते हैं।जिसके कारण हम सदा किसी न किसी सांसारिक चीज के खोने के भय व आशंका से ग्रसित रहते हैं।
हमको अच्छे से समझना चाहिए कि पूर्व संस्कार हमारी चेतना में किन्ही सांसारिक
चीजो के प्रति तीव्र झुकाव व लालसा की अनुभूति कराते हैं।
जिसके कारण विभिन्न प्रकार की सांसारिक इच्छाएं जन्म लेती हैं और
हम इन इच्छाओं की पूर्ति के लिए लालायित रहने लगते हैं।
जिसके परिणाम स्वरूप हम "श्री माँ" द्वारा प्रदत्तअपने आत्मानुत्थान
के लिए प्राप्त समय को बड़ी बेदर्दी से गवाते ही चले जाते हैं।
और जब इस शरीर रूपी जीवन की सांझ नजदीक आ जाती है केवल तब ही हमें यह एहसास हो
पाता है कि हमने अपना बहुमूल्य जीवन यूँ ही गंवा दिया।
तब बड़ा पछतावा होता है और पछतावे की सच्ची अग्नि रूपी हवनकुंड में अपनी समस्त
कंडिशनिग को आहूत करते हुए हमारी चेतना स्थूल शरीर को छोड़ने के लिए बहुत जद्दो जहद
करती है।
और तीव्र पीड़ा से तड़पते हुए "परमपिता" से एक और अवसर(अगला जन्म)
प्रदान करने की गुहार लगाती है।
अब ये "उनकी" मर्जी है कि "वे" हमारे कर्मानुसार हमें
अगला जन्म प्रदान करते हैं या हमारी चेतना को पीड़ाओं के अनंत दौर से गुजरने के लिए
कुछ काल के लिए ऐसे ही छोड़ देते हैं।
हमें यह बात अत्यंत सूक्ष्मता के साथ अपनी चेतना में उतारना चाहिए कि शरीर के
मृत्यु-काल में भी अपने पूर्व संस्कारों का मजबूरी में त्याग करना होगा वर्ना
मृत्यु हमसे कोसो दूर रहेगी।
तो क्यों हम उस दुरूह काल की प्रतीक्षा करें ?
क्यों न आज और अभी से ही एक एक करके अपनी समस्त कंडिशनिग को 'गहन ध्यान व चिंतन"
के प्रत्येक 'हवन' में आहुतियों के रूप में
विसर्जित करते चले।
और आनदायी 'मुक्त अवस्था' का इसी जीवन काल में भरपूर
लुत्फ उठाते हुए और जी भर के "परमेश्वरी" की इस सुंदर रचना का आनंद लें।
यकीन मानिए उपरोक्त आंतरिक घटनाक्रम के चलते आपको अपने यंत्र को सन्तुलित व ठीक रखने केलिए किसी भी प्रकार की स्वच्छता प्रक्रियाओं से गुजरने की बिल्कुल भी आवश्यकता नहीं रहेगी।
*जब संस्कार ही नहीं तो कोई बाधा भी नहीं।*🙏😌❤️🌹👍
-----------------------Narayan
"Jai Shree Mata Ji"
01-07-2022