"गहनता प्राप्ति के मुख्य अवरोध"
वे अनेको पूजा व सेमिनार्स में भी शामिल होते रहते हैं, बिना नागा सेंटर्स
भी जाते हैं,अपने यन्त्र की क्लीयरिंग में भी काफी समय लगाते हैं,ध्यान के लिए अच्छा
खासा समय देते हैं।
किन्तु न जाने फिर भी उनके भीतर गहनता क्यों नहीं स्थापित जो पाती ?
इतने लंबे काल के बाद भी अभी तक उनका स्तर क्यों कर उथला व हल्का नजर आता है ?
इस वर्ग में आने वाले कुछ सहजी तो वे हैं जिनको समय समय पर "श्री
माँ" के साक्षात सानिग्धय का सुअवसर तक मिला है।
यही नहीं ध्यान के समय अक्सर उनको अपनी कुंडलिनी सहस्त्रार पर अच्छे से अनुभव
देती है और वायब्रेशन भी खूब आते हैं।
किन्तु फिर भी उनके भीतर गहनता व स्थित-प्रज्ञता की स्थापना नहीं हो पाती।छोटी छोटी विपरीत बातों,स्थितियों, परिस्थितयों से उनका सन्तुलन तुरंत ही बिगड़ जाता है।
कई कई दिन तक उनका ध्यान ठीक प्रकार से लग नहीं पाता और न ही ध्यान के मतलब की
मनोस्थिति ही बन पाती है।
और रात दिन वे किन्ही बाधाओं के बारे में ही चिंतित रहते हुए स्वयं से ही संघर्ष करते रहते हैं।आखिर ऐसे कौनसे ऐसे कारण हैं ?
जो उनके लम्बे काल से "श्री चरणों" में होने के वाबजूद भी उनके
अन्तःकरण में वांछित आनंद में बने रहने की स्थिति से वंचित कर रहे हैं।
हमारी चेतना व आंतरिक समझ के अनुसार गहनता में उन्नति न होना का मुख्य कारण
हैं उनकी चेतना का अच्छे से विकसित न हो पाना।
यदि हम इसे आसानी से समझना चाहें तो कह सकते हैं कि,
*उनकी कुंडलिनी भले ही ध्यान के दौरान उनके सहस्त्रार पर
आरूढ़ रहे किन्तु उनकी चेतना नीचे के 6 चक्रों में से किसी न किसी
अथवा किन्हीं चक्रों के गुण-दोषों में फंसी रहती है।*
होता यह है कि,अधिकतर सहजी ध्यान अवस्था के दौरान अपने दोनों हाथों में
वायब्रेशन्स को महसूस करते हुए अपनी कुंडलिनी को अपने सहस्त्रार पर पाकर सन्तुष्ट
हो जाते हैं।
किन्तु इसी सुंदर अवस्था के दौर का आनंद लेने के बाद अपने स्वयं के आंतरिक
अस्तित्व को जानने के लिए कोई भी प्रयास तक नहीं करते।
और न ही अपने भीतर में रहने वाली अनेको विभूतियों यानि अपनी जीवात्मा,अपनी आत्मा,अपने समस्त
देवी-देवताओं,आदि गुरुओं के साथ कोई सम्पर्क ही साधने का प्रयत्न ही करते
हैं।
नतीजन, उनका आंतरिक ज्ञान उनकी स्वयं की चेतना में न तो प्रगट ही
हो पाता है और न ही अन्य सहजियों के लिए प्रस्फुटित ही हो पाता है।
जिसके परिणाम स्वरूप वे अपने स्वयं के 'आत्मज्ञान' से वंचित रहते हैं
जो उनकी चेतना में गहनता प्रदान करने में सक्षम हो सकता है।
ध्यान के हजारों दौर के बाद भी उनकी चेतना उनके किसी न किसी चक्र के गुण-दोषो
में लिप्त रहने के कारण उन्नत नहीं हो पाती।
और न वे स्वयं भी कभी ध्यानस्थ अवस्था में अपने
आत्म-चिंतन/आत्म-विश्लेषण/आत्म-निरीक्षण के दौर के द्वारा उन गुण-दोषो से
निर्लिप्त रहने का प्रयास ही करते हैं।
वरन, वे अक्सर अपने किन्ही चक्रों की अड़चनों को नकारात्मकता का
प्रभाव मानते हुए 'सफाई-अभियान' में लगे रहते हैं।
इस तथ्य को समस्त चक्रों के देवताओं के विपरीत कार्य करने वाली मनो दशाओं के
कुछ उदाहरणों से भी समझ सकते हैं :-
1.अब जैसे कोई सहजी किसी न किसी कारण से जाने-अनजाने में झूठ,चालाकी,छल,फरेब,दिखावे आदि का सहारा
लेता है।
तो उसका मूलधार ही नहीं अपितु सभी चक्रो के देवता निश्चित रूप से अप्रसन्न ही रहेंगे
परिणाम स्वरूप उसके सभी चक्र समय समय पर पकड़ते रहेंगे।
2."माँ सरस्वती व ब्रहम्मा जी" के द्वारा उचित कार्यों के माध्यम से रोजी रोटी को चलाने/चेतना के कार्यो को आगे बढ़ाने के लिए जो गुण प्रदान किया है।यदि कोई उसका दुरुपयोग करेगा तो उसका स्वाधिष्ठान चक्र कभी भी ठीक नहीं रहेगा।
3.यदि किसी सहजी में भौतिक/आध्यात्मिक स्तर पर किसी भी प्रकार
की असन्तुष्टि विद्यमान रहेगी तो उसकी नाभि हर हाल में जकड़ती रहेगी।
4.यदि कोई सहजी सांसारिक/आध्यात्मिक क्षेत्र में अपने
पद/प्रतिष्ठा/पैसे का अभिमान/दुरुपयोग करते हुए किसी अन्य की चेतना पर शासन करने
का प्रयास करेगा तो उसका हृदय निश्चित रूप से बाधित होगा।
5.यदि कोई सहजी किसी के प्रति दूषित/द्वेष भावना रखने के साथ
साथ स्वयं साक्षी भाव की वहेलना करते हुए किसी अन्य सहजी में दोष भाव रोपित करने
का प्रयास करेगा/करता है, तो उसकी विशुद्धि गड़बड़ ही
रहेगी।
6.यदि कोई सहजी अन्यों मानवों के प्रति जात-पांत,अमीर-गरीब,स्वर्ण-दलित,ऊंच-नीच,पदस्थ-अपदस्थ व धर्म के
आधार पर भेद-भाव करता है तो उसका आगन्या कभी भी ठीक नहीं रह सकता।
और साथ उसे "श्री महादेव" के साथ साथ सभी देवी-देवताओं,रुद्रों,गणों,आदि गुरुओं की
नाराजगी भी झेलनी पड़ेगी।
7.यदि किसी भी सहजी का "परमात्मा"/"श्री माँ" पर पूर्ण विश्वास नहीं है।और न ही वह अपने अस्तित्व व अपने अस्तित्व से जुड़े संसार को "उनके" "श्री चरणों" में अर्पित करता है।तो उसके सहस्त्रार व मध्य हृदय के साथ जुड़ाव बनाये रखने में सदा अड़चन बनी ही रहेगी।
अब इसके दूसरे पक्ष के चिंतन की ओर चलते हैं:
यानि कोई सहजी आत्मसाक्षात्कार को प्राप्त होने के कुछ काल बाद अपने किसी चक्र
के प्रगट हुए गुण को "श्री माता जी" का आशीर्वाद मानते हुए उसमें पूरी
तरह लिप्त होकर उसी में सदा डूबा रहता है।
यानि अपने उसी गुण के माध्यम से पद/ पैसा/प्रतिष्ठा/प्रसिद्धि/प्रशंसा/पहचान
बनाये रखने में ही लगा रहता है तो उसकी भी चेतना 'आत्म-ज्ञान' से पुष्ट नहीं हो
पाती।
परिणाम स्वरूप वह जो भी ज्ञान अन्य सहजियों से शेयर करता है वह उसके स्वयं का
अनुभव किया हुआ कम, उधार का, यानि,देखने/सुनने/पढ़ने व
मानसिक रूप से समझने के द्वारा अर्जित किया हुआ ज्यादा होता है।
जिसके कारण उस शेयरिंग में उसके आत्मज्ञान से प्रस्फुटित होने वाली 'पवित्र ऊर्जा' की नगण्यता रहती है।
जिसकी वजह से अन्य लीगों की कुण्डलनियाँ उसकी अपनी स्वयं की ऊर्जा से उठ नहीं पाती।परिणाम स्वरूप उसकी कुंडलिनी को अन्य उठी हुई कुण्डलीनियों से प्रेम व शक्ति नहीं मिल पाती।
जबकि ऐसे सहजियों के यन्त्र का प्रयोग कर "श्री माँ" लोगों को समय
समय पर आत्मसाक्षात्कार भी प्रदान करती रहती हैं।
किन्तु ऐसे सहजी नए व पुराने सहजियों को गहन ध्यान में उतारने का माध्यम तब तक
नहीं बन सकते।
जब तक वे शुद्ध इच्छा व तीव्र लगन के साथ अपनी चेतना को विकसित करने के लिए
अपनी गहनता में उतर कर अपने 'स्व' के साथ एकाकारिता
स्थापित नहीं कर लेते।"🙏😌❤️🌹
----------------------------------Narayan
"Jai Shree Mata Ji"
11-07-2022