"स्वाभिमान'-पोषण"
"एक जागरूक मानव
को अपने 'स्वाभिमान'
का पोषण और रक्षा ऐसे ही
करना चाहिए जैसे कि हम अपनी संतान के लिए करते हैं।
क्योंकि
स्वाभिमान का अभिप्राय हमारे द्वारा हमारे 'स्व' यानि हमारी स्वयं की
'आत्मा' के मान का सम्मान करने से है जो कि
"परमात्मा" का अभिन्न अंग है।
यदि हम अपने
स्वाभिमान के प्रति पूर्ण रूप से सजग हैं तो हम हमारे भीतर में रहने वाले
"ईश्वर" के अंश का पूर्ण श्रद्धा व प्रेम से सम्मान कर रहे हैं जो
पूर्णता के पर्याय हैं।
जब हम
"परमपिता" को अपनी आत्मा के रूप में अनुभव करने लगते हैं तो हमारे भीतर
दाता वाले भाव उत्पन्न होने लगते हैं।
जिसके परिणाम
स्वरूप स्वाभिमान परिपक्वता की ओर अग्रसर होने लगता है।तब मानव में 'निर्लिप्तता' रूपी दिव्य गुण पनपने लगता है।
जब निर्लिप्तता
प्रगाढ़ होने लगती है तब मानव 'साक्षी' भाव में स्थित हो
"प्रभु" की इस रचना का भरपूर आनंद लेने लगता है।
और जब उसकी
मानवीय देह के पंचतत्व में विलीन होने का काल निकट आता है तब वह अत्यंत शांति के
साथ अपने स्थूल शरीर को पुष्पों की भांति "परमेश्वर" के "श्री
चरणों" में अर्पित करते हुए प्रसन्नता के साथ अपनी नश्वर देह का त्याग कर
देता है।"🙏😌❤️🌹
------------------------------Narayan
"Jai Shree Mata Ji"
03-09-2022
No comments:
Post a Comment