"मनुष्य के विचित्र तथ्य"
"समस्त प्राणियों में सर्वोच्च चेतना धारी मानव ही इतना विचित्र प्राणी है जो स्वयं की अनेको तृष्णाओं की अनंत क्षुधा को तृप्त करने की खातिर।
लाभ-हानि,मान-अपमान रूपी मिथ्या भावनाओं के धागे से बने
कंडीशनिंग रूपी जाल को स्वयं ही बुनता है।
फिर उसमें
स्वेच्छा से फंसता है,और युगों युगों
तक उसमें से बाहर निकलने के लिए छटपटाता रहता है।
फिर सबके सामने
अपने तथाकथित दुखों के पिटारे को खोल खोल कर दिखाते हुए हरदम कहता फिरता है कि
उसकी किस्मत में बहुत सारे कष्ट व परेशानियां लिखें हैं।
जबकि अत्यंत छोटी
चेतना की प्राणी मकड़ी जो अपने शरीर से स्त्रावित होने वाले द्रव्य से जो जाला
बुनती है।
वह केवल भोजन
ग्रहण करने की उसकी नैसर्गिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए ही बुनती है और स्वयं
अपने बने जाल में कभी फंसती नहीं है।
यदि मानव भी अपनी
स्वाभिक आवश्यकताओं की पूर्ति तक ही सीमित रहे।
और उनको पूरा
करने के लिए निर्लिप्त भाव में ईमानदारी,निष्ठा व लगन के साथ कार्य करता रहे तो वह कभी भी दुखी व
पीड़ित नहीं रह सकता।"🙏😌❤️🌹
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