"This Blog is dedicated to the "Lotus Feet" of "Her Holiness Shree Mata Ji Shree Nirmala Devi" "Who" Incepted and Activated "Sahaj Yoga", An Entrance to the "Kingdom of God" since 5th May 1970.It is Created in June 2010."
Monday, June 12, 2017
Monday, June 5, 2017
"impulses"--376
"Impulses"
1)"ध्यान एक 'महासागर' की तरह से है जो हमारी अनेको प्रकार की भौतिक व् अलौकिक मनो-दशाओं, मनो-वृतियों, स्मृतियों, चिंताओं, चिंतन, भावनाओं, अनुभूतियों व् अनुभवों रूपी नदियों को अपने भीतर समां कर हमें अनंत आनंद, वात्सल्य व् प्रेम प्रदान करता है।
क्योंकि यह हमें "परमपिता" के "श्री चरणों" में स्थित कर देता है जहाँ हम पूर्ण रूप से स्व्तंत्रता का स्वाद चख पाते हैं ।"
2)"एक तरफ तो हम अपने अपने गुरु तत्व को जगाने के लिए "श्री माँ" से प्रार्थना करते हैं व कहते है "श्री माता जी हमें स्वम का गुरु बना दीजिये"। और यदि किसी का गुरु तत्व जाग्रत हो जाता है और वह जाग्रति देने लगता है तो उसको अक्सर अन्यों के द्वारा रोका जाता है, कहा जाता है की जाग्रति देने का तरीका गलत।
यह बात बड़ी हास्यापद है, क्योंकि कुण्डलिनी का जागरण केवल "आदिशक्ति" ही कर सकती हैं, ये बात सब भूल जाते हैं। अत: एक दूसरे के गुरु तत्व का सम्मान करना चाहिए। जब स्वम "श्री माता जी " ने बताया है कि दस गुरु होते हैं जिनकी सूक्ष्म चेतना हमारे भीतर विद्यमान है। और एक हम स्वम्, आत्म-साक्षात्कार के बाद 'स्वयं-के-गुरु' पद को प्राप्त होते हैं तो हम सभी कम से कम 11 प्रकार से ही सहज सीखेगे व बताएँगे।"
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"Jai Shree Mata Ji"
Friday, June 2, 2017
"Impulses"--375--"निर्थक शास्त्रार्थ"
"निर्थक शास्त्रार्थ"
"ये अक्सर देखने में आता है कि ज्यादातर सहजी "श्री माता जी" के लेक्चर्स पर शास्त्रार्थ करते हुए आपस में खूब बहस करते दिखाई देते हैं।और अपने मॉनसिक ज्ञान के आधार पर एक दूसरे को दबाने का भरसक प्रयास कर रहे होते हैं। और कभी कभी तो इतने उत्तेजित हो जाते है कि आपसी प्रेम भाव को विस्मृत कर एक दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं।
सबसे हैरान करने वाली बात तो तब और भी होती है जब वे ये भी बताना शुरू कर देते हैं कि "श्री माता जी" ने अमुक बात अमुक कारण से कही है। मानो "श्री माता जी" ने ऐसे सहाजियों को अपना 'प्रवक्ता' बना दिया हो, और "उनके" समस्त लेक्चर्स के कारणों व् उद्देश्यों से पूरे संसार को अवगत कराना बस उन्ही की जिम्नेदारी है।
जब उनसे उनके स्वम् के ध्यान के वास्तविक अनुभवों व् अनुभूतियों के आधार पर कोई प्रश्न पूछ लिया जाए तो वो दाएं बाएं बगले झांकते प्रतीत होते हैं। वास्तविक अनुभव न होने के कारण ऐसे सहजी ठीक प्रकार से उत्तर न दे पाने की जद्दो जहद से बचने के लिए पूछने वालों की ही कमिया गिना देते हैं।
उनके चक्र में पकड़ बता कर अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करते हुए सहज के कर्मकांडो के जरिये उन्हें क्लीयरिंग करने की सलाह भी देने लगते है।
कई बार तो ऐसा प्रतीत होता कि जैसे कुछ सहाजियों ने "उनके" लेक्चर्स पर PHD करके "श्री माँ" के समस्त वक्तव्यों पर अपना अधिकार ही जमा लिया हो।
यानि उनको "माँ" के लेक्चर्स से जो भी मानसिक आधार पर समझ आया है केवल वही ठीक है और जो अन्य लोग भीतर से समझ रहे हैं वो सब गलत है। ये तो ऐसे ही हुआ मानो आलू को पेटेंट करके उसकी रेसिपी को अपने नाम से रजिस्टर्ड करा लिया जाए ताकि कोई अन्य व्यक्ति आलू की सब्जी अपने तरीके से कभी भी न बना सके।
मेरी चेतना के अनुसार"श्री माँ" के लेक्चर्स को लेकर आपस में डिबेट करने से अच्छा है कि जो भी हमने ध्यान में अनुभव किये हो केवल वही नए व पुराने सहजियों को बताएं जाएँ व उन्ही अनुभवों के आधार पर उन्हें सिखाया जाए। क्योंकि अपने अनुभवों को आसानी से साबित किया जा सकता है। बिना अपने अनुभव के मुख न ही खोला जाये तो ही बेहतर होगा।"
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"Jai Shree Mata Ji"
Thursday, June 1, 2017
"Impulses'--374--""अपरिवर्तनीय कर्मफल"
"अपरिवर्तनीय कर्मफल"
"हममें से बहुत से साधक इसीलिए ध्यान करते हैं कि ध्यान के माध्यम से अर्जित शक्तियों के द्वारा वे अपने नकारात्मक प्रारब्ध को परिवर्तित कर सकें। और नकारात्मक प्रारब्ध की प्रतिक्रियाओं
के परिणाम स्वरूप वर्तमान जीवन में घटित होने वाली विभिन्न प्रकार की समस्याओं, कठिनाइयों, कष्टों व् पीड़ाओं के संताप से बच् सकें।
मेरी चेतना के अनुसार वास्तव में यह असंभव है, क्योंकि जैसे पिछली कक्षा की परीक्षा का परिणाम आने के बाद बदला नहीं जा सकता, इसी प्रकार से प्रारब्ध का परिणाम भी नहीं बदला जा सकता।
हाँ, यदि अच्छे से पढाई की जाए तो वर्तमान कक्षा की परीक्षा में अच्छे नम्बर लाये जा सकते हैं जिससे पिछली कक्षा की परीक्षा में कम नंबर लाने का दुःख समाप्त किया जा सकता है।
यानि इस वर्तमान जीवन में हम ठीक प्रकार से ध्यानस्थ रह कर पूर्ण समर्पित भाव में अन्य लोगों को 'जागृति' देने व् 'चेतना' को बढ़ाने के कार्यों में निरंतर लगे रहकर अपने भौतिक कर्तव्यों का पूर्ण निष्ठा व् ईमानदारी से पालन करते जाएँ।
तो निश्चित रूप से प्रारब्ध के परिणाम स्वरूप मिलने वाली पीड़ाओं व् कष्टों के एहसास से मुक्ति मिल जाती है। क्योंकि वर्तमान की उपलब्धियां पूर्व जीवन से प्राप्त कमियों के एहसास को पूर्णतया नष्ट कर देती हैं। जिस प्रकार सुन्दर सुन्दर आभूषण व् वस्त्र कुरूप से कुरूप शरीर को ढक कर उसके व्यक्तित्व की शोभा बढ़ा देते हैं।
उसी प्रकार ध्यान के माध्यम से जब हम "परमपिता" से एकाकारिता का आनंद उठाने लगते हैं तो हमारा वर्तमान जीवन पुष्प सम महकने लगता है जो स्वम् को भी आनंदित रखता है और अन्य लोगों को भी लाभान्वित करता है। अतः किसी भी प्रकार के पूर्व या वर्तमान के दुःख का स्थान हमारे जीवन में शेष नहीं रह जाता।"
--------------------------Narayan
"Jai Shree Mata Ji"
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