Friday, January 13, 2017

"Impulses"--331--"निर्विकल्पता"

"निर्विकल्पता"

"किसी भी प्रकार की विपदा से बचने के लिए मन के द्वारा दिए गए विकल्प को न अपना कर हृदय के द्वारा दिखाए गए मार्ग पर चलना ही आंतरिक तपस्चर्या की ओर पहला कदम है।

मन के जितने भी विकल्प होते हैं वे केवल और केवल वर्तमान में घटित होने वाली सत्य घटनाओं का सामना न करने व् यथार्थ से पलायन करने की प्रवृति को बढ़ाने का ही कार्य करते हैं ।

जो भी हम कर चुके होते हैं उसको पलटा नहीं जा सकता, अतः उस करे हुए कार्य के नकारात्मक परिणामों से बचने के लिए मन के विकल्पों को अपनाना, "श्री चरणों" में पूर्ण समर्पण से दूर ले जाने का ही कार्य करता है।

जिससे हमारे भीतर और भी ज्यादा अशान्ति उत्पन्न होती है और हम बिना बात के बैचैन रहते हैं और ये बैचैनी दीमक की तरह धीरे धीरे हमारे अनमोल स्वास्थ्य को निगल जाती है और हम वास्तविक रूप से कंगाल हो जाते हैं।"

---------------------------------Narayan
"Jai Shree Mata Ji"

Saturday, January 7, 2017

"Impulses'---330---"कंगूरा"--अनुभूति -40

"कंगूरा" 

"नाज न कर ए 'कंगूरे' अपनी शोखी और अदा पर,

जिस दीवार पर तू सजा है, उस दीवार को खड़ा किया है, उन नीव में 'दफ़न' ईंटो ने,

जो हर शख्स की नजरों से दूर, सुकून में बसर करती हैं,

मत जलील कर उन 'रहनुमा' ईंटों को, जिनकी 'तबियत-ऐ-इश्क' ने तुझे ये मुकाम बख्शा है,

जिनकी बेपनाह मुहब्बत और रहमदिली ने ये 'बुर्ज खलीफा' बनवाया है,

और दुनिया की कद्र का तुझे ये मौका दिलाया है,

हकदार हैं वो सभी ईंटें उस 'कद्र-ओ-तारीफ' की,

जो जज्ब हो गईं हँसते हँसते, इक 'ख्याल-ऐ-गुलिस्तां' की खातिर,

उनकी 'दिले-ऐ-तकलीफ' अब "खुदा" से भी सही न जायेगी,

"अल्लाह" की नाराजगी 'क़यामत-ऐ-जलजले' को उकसाएगी,

जिसकी खौफनाक हलचलें तेरी 'हस्ती-ऐ-वजूद' को फिर से मिटटी में मिला जाएंगी।"


----------------------------Narayan
"Jai Shree Mata Ji"




(कंगूरा=बाहरी अस्तित्व(Personality),

दीवार=हमारा जीवन(Life),
नींव की ईंट=हमारी आत्मा(Spirit),
बुर्ज खलीफा=बेश कीमती मानव शरीर(Human Body),
'ख्याल-ऐ-गुलिस्तां'=मोक्ष (Salvation),
क़यामत-ऐ-जलजला= 'मुक्ति' का सुनहरी अवसर खो देना जो 84 लाख योनियों से गुजर कर हमें प्राप्त होता है।
(Forced to go through the Longest 'Process of Evolution= Amoeba-Human, A very painful Journey for a Soul)



Tuesday, January 3, 2017

"Impulses"---329---"पीड़ा-परिवर्तन"

"पीड़ा-परिवर्तन"

"अक्सर साधक/साधिका कुछ समस्याओं के चलते बेहद दुखी हो जाते हैं और सोचने लगते हैं कि ये परेशानियां कब ख़त्म होंगी, कब वो समय आएगा की हम चैन की सांस ले पाएंगे और मुक्त आकाश में पंछी बन कर उड़ेंगे।

समय बीतता जाता है पर वो शुभ दिन आने का नाम ही नहीं लेता और इधर साधकों/साधिकाओं के मन में धीरे धीरे उस इन्तजार का एहसास भी मिटने लगता है और एक दिन वो ख्याल ही मिट जाता है।

परंतु आश्चर्य की बात ये होती है की अब वो परेशानियों हमें परेशान करना बंद कर देती है, सब कुछ वैसा ही चल रहा होता है किन्तु हमारा नजरिया ही बदल जाता है। क्योंकि वो पीड़ाएँ जीवन का हिस्सा बनकर हमारे साथ ही रहने लगती हैं और अब उनसे पीड़ा होनी बंद हो जाती है।

जैसे यदि किसी की हड्डी टूटने पर उसे 6-7 दिन तो काफी दिक्कत महसूस होती है परंतु धीरे धीरे उस अवस्था की आदत होने की कारण वो अवस्था से वह ज्यादा परेशान नहीं होता।

जरा चिंतन करके देखें तो पाएंगे कि सबकुछ जल्दी ठीक होने की अपेक्षा ही हमें अधीर कर रही थी और हम उसी आशा के कारण स्वम् को अनजाने में तकलीफ दे रहे थे किन्तु जब उम्मीद ही समाप्त हो गई तो पीड़ा भी ख़त्म हो गई।

क्योंकि ये समझ आ गया है कि हमारा जीवन मालिक के द्वारा दी गई एक कार के सामान है जिसके हम ड्राइवर हैं, अपनी इच्छा से हम इसे कहीं भी ले जा नहीं सकते और न ही इसका स्वम् के लिए उपयोग ही कर सकते हैं'।"

--------------------------------------------------------Narayan
"Jai Shree Mata Ji"

Monday, January 2, 2017

"Impulses"---328---"नव-वर्ष / नव-हर्ष"


"नव-वर्ष / नव-हर्ष"

"नववर्ष शब्द दो शब्दों व् चार वर्णों से मिलकर बना है यानि नव=न=नवीन=नया, व्=वरण=अपनाना और
वर्ष=व्=व्याप्त, र्ष=हर्ष=प्रसन्नता।

यानि नवीनता में समाये 'हर्ष' के साथ हमारे जीवन में घटित होने वाले नए पलों का स्वेच्छा से वरण करना यानि हृदय से एक नए अंदाज में स्वीकार कर "परमात्मा" के द्वारा प्रदान किये गए इस मानवीय जीवन का भरपूर आनंद उठाना।

नवीनता की इस नव-बेला में, नव-पलों, नव-भावो, नव-अनुभूतियों, नव-उमंगों, नव-योजनाओं, नव-श्रृंगार, नव-रसों, नव-स्वादों, नव-आशाओं, नव-सृजन एवम नव-चिंतन से आच्छादित हृदए से ओतप्रोत ये 'चेतना' समस्त 'जागृत चेतनाओं' को नव-वर्ष '2017' के लिए अनेकानेक शुभकामनाएं प्रेषित करती है।

"परमपिता परमेश्वर" के द्वारा प्रदत्त इस 'अनमोल जीवन' को हर रूप में सार्धक बनाने के लिए "परमेश्वरी" से हार्दिक अनुग्रह व् प्रार्थना करती है कि, "मानव देह में उपस्थित समस्त जीवात्माओं को उनका अंतिम लक्ष्य यानि 'मोक्ष' प्राप्त हो और सभी मुक्त चेतनाएं इस रचना के सुव्यवस्थित संचालन में "परम माता" के लिए अपनी भागीदारी प्रस्तुत कर सकें।

"माँ सर्वेश्वरी" आप सभी के हृदयों में 'आनंद, संतुष्टि व् आत्मज्ञान' के 

दीपकों को प्रज्वलित कर आप सभी के अन्तः कारणों को 'आलो

कित' करें ताकि आप सभी का ये 'पुनर्जन्म' सार्थक हो सके।"

यदि हम गहनता से चिंतन करके देखें तो हम पाएंगे कि हमारी चेतना में स्थित नवीनता के प्रति हमारा आकर्षण व् झुकाव आंतरिक व् नैसर्गिक है। ये कहीं से कहीं तक भी हमारे मन में विद्यमान पूर्व संस्कारों के परिणाम स्वरूप घटित होने वाले बाह्य घटनाक्रमो पर आधारित तूलना, प्रतिस्पर्धा, पसंदगी, नापसंदगी, मोह, घृणा, ईर्ष्या आदि भावों पर निर्भर नहीं करता है।

वरन ये सुखद अनुभूति, तो इस 'रचना' की रचना के साथ ही स्थापित हुए परिवर्तन के 'शास्वत नियम' के कारण हमारे अंतःकरण में समय समय पर प्रस्फुटित होती रहती है।

यदि हम गंभीरता से अवलोकन करें तो हम पाएंगे कि इस रचना में समस्त चीजे गतिमान हैं। समस्त ग्रह, नक्षत्र, आकाश-गंगाएं, हमारी धरा, इस धरा पर उपस्थित हर प्रकार का जीवन, ऋतुएँ, हमारे सूक्ष्म यंत्र में स्थित समस्त चक्र, नाड़ियाँ, हृदए, नब्ज, शिराएं, धमनियां किसी न किसी रूप में गति कर रहे हैं। 

और यही गति परिवर्तन की कारक है और परिवर्तन ही विभिन्न प्रकार की नवीनताओं का उत्प्रेरक है। इसीलिए हम सभी की आंतरिक व् बाह्य स्थिति बदलती रहती है, वो कभी भी पूर्व की तूलना में एकसी नहीं रहती है।

किन्तु एक 'विभूति' हमारे भीतर है जो अज्ञानता के कारण जड़ हो जाती है और जड़ता के कारण परिवर्तन नहीं चाहती है,और वो है हमारा 'मन'। वास्तव में हमारा मन 'स्मृति' पर कार्य करता है, और अक्सर स्मृति ही मन के भीतर जड़ता को उत्पन्न करती है।

जब जाने अनजाने में हमारी कुछ आवश्यक आवश्यकताएं उचित समय पर किन्ही कारणों से पूर्ण नहीं हो पाती हैं तो जरूरतें धीरे धीरे हमारी अतृप्त इच्छाओं में परिवर्तित होकर मन की स्मृति का हिस्सा बन जाती हैं और अनादी काल तक हमारे मन में बनी रहती हैं। यहाँ तक कि वर्तमान जीवन से गुजरकर हमारी मृत्युपरान्त अगले जीवन चक्रों में भी पहुँच जाती हैं।

इन्ही इच्छाओं के कारण हमारी चेतना कुछ काल के लिए एक ही स्थिति में ढहर जाती है किंतु उस तीव्र इच्छा के वृत में परिक्रमा करती रहती है। हमारे जिस चक्र के गुण से सम्बंधित वो इच्छा होती है उससे जुड़े स्नायु तंत्र व् उस स्थान को वो लंबे समय में रोगी बना देती है और हमें किन्ही बिमारियों से दो-चार होना पड़ता है।

इसका आशय ये हुआ कि यदि हम अपने जीवन के बाह्य या आंतरिक परिवर्तनों को स्वेच्छा से स्वीकार कर पूर्ण समर्पित भाव में गति नहीं करेंगे तो निश्चित रूप से हम उत्थान की ओर अग्रसर नहीं हो पाएंगे और अंततः हम अधोगति को प्राप्त होंगे।


यानि "परमात्मा" व् 'माता प्रकृति' की इच्छा से घटित होने वाले परिवर्तनों को पूर्ण हृदए से ग्रहण कर उल्लसित भाव में इस 'दुर्लभ-मानवीय-जीवन' के "रचनाकार" की हर पल वंदना करते हुए नव-सृजनित व् पुष्पित पलों का आनंद उठाते हुए अपने जीवन यात्रा को सार्थक करें।"

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"Jai Shree Mata Ji"