Friday, May 19, 2017

"Impulses"--368--परेशानी

"परेशानी"

"परेशानी का वास्तविक मतलब:--

ये शब्द तीन शब्दों से मिलकर बना है,

यानि ,परे+शा+नी,

परे=पार ब्रह्म,

शा=शरण से आना,

नी=नीर=ऊर्जा रूपी धारा="माँ आदि शक्ति" की शक्ति,

'जो 'धारा' के रूप में इस धरा पर जीवात्माओं का कल्याण करने के लिए अवतरित हुई हैं।

यानि 'पार ब्रहम्' की शरण से आने वाला नीर(अमृत)।

जो हम सभी के सहस्त्रार पर आभासित होती हैं।

यानि जब मानव के जीवन में अत्यधिक परेशानी बढ़ जाती है।

तभी यह 'दिव्य धारा' मानव को प्रेम प्रदान कर संतुलित करने के लिए 'ईश्वर' की ओर ले जाती है।तो फिर कैसी परेशानी ? "

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"Jai Shree Mata JI"

Thursday, May 18, 2017

"Impulses"--367--"साकार पूजा या निराकार पूजा"

"साकार पूजा या निराकार पूजा"


"प्रभु" की पूजा के दो ही पहलु होते हैं और वो हैं 'साकार' या निराकार,

साकार शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है,

'साकार'=सा+कार्य

यदि हम इन दोनों की संधि विच्च्छेद करें तो यह 6 वर्णो में परिवर्तित हो जाता है जो हमारे जन्म जात षट्-रिपुओं को मित्र में परिवर्तित करने का प्रतिनिधित्व करते हैं।

स+अ+क+अ+र+य,

i) स', स्वरूप को प्रगट करता है, 'स' मूलाधार चक्र का सुर है, जिसके अधीष्ठा "श्री गणेश" हैं, जिनका स्वरूप शास्वत व् अमर है, यानि जो प्रसन्न होकर हमें आशीर्वादित करने के लिए समय समय पर स्वरूप में भी प्रगट होते रहते हैं।

ii) अ', हमारी 'आत्मा' का प्रतिनिधित्व करता है,

iii) क, किये जाने वाले बाह्य कार्य को प्रगट करता है,

iv) अ, "श्री गणेश" के अविरल प्रेम-प्रवाह के घटित होने की स्थिति को दर्शाता है,

v) र, "उनके" प्रेम से उत्पन्न होने वाली शक्ति का प्रतीक है,

vi) य, योग यानि जोड़ को उदभाषित करता है,

यानि, "परमात्मा" की 'साकार' पूजा हम तभी कर पाएंगे जब "श्री गणेश" की शक्ति की अविरल धारा का योग हमारी आत्मा से हो जाए।

या हमारी आत्मा के भीतर "श्री गणेश" आभासित होने लगें तभी हम "देवी देवताओं" की 'साकार' पूजा करने की योग्यता प्राप्त कर पाएंगे।

और निराकार भी दो शब्दों के योग का परिणाम है,

यानि निरा+कार्य,

और संधि विच्छेद करने पर ये 7 वर्णो में विभक्त हो जाता है जो सातों चक्रो की सात अवस्थाओं को प्रगट करता है।यानि,

न+ई+र+अ+क+अ+र,

न=नगण्यता, चित्त को केंद्रित करने के लिए स्वरूप की आवश्यकता न रहना,

ई=शक्ति, की ऊर्जा के रूप में अनुभूति होना,

र=रमना, ऊर्जा की धारा में चित्त,चेतना, मन व् जागृति का डूबना,

अ=अन्तःकरण, का इस ऊर्जा-धारा से आच्छादित होना,

क=कार्यान्वन, सम्पूर्ण सूक्ष्म यंत्र में स्थित समस्त चक्रों, नाडियों का जागृत होकर कार्यशील होना,

अ=आत्मा, समस्त शक्तियों व् जागृत देवी-देवताओं की ऊर्जा से आत्मा का प्रकाशित होना,

र=रमण, आत्मा के प्रकाशित होने के उपरांत इस 'दिव्य सामूहिक ऊर्जा' का हमारे यंत्र से सर्वकल्याण के लिए बाहर की ओर बहना।

य=योग, ब्रहम्माण्ड की समस्त दिव्य विभूतियों व् शक्तियों में योग, यानि सामूहिक शक्ति का हमारे अस्तित्व से एकाकार होना।

यानि उपरोक्त सूक्ष्म घटनाएं हमारे अस्तित्व में जब घटित होने लगती हैं तब ही जाकर हम 'निराकार पूजा' से जुड़ने के योग्य हो पाते हैं।

या हम ये भी कह सकते हैं कि 'निराकार पूजा' में शामिल होने के उपरान्त उपरोक्त अनुभूतियाँ व् लक्षण हमारे भीतर आभासित होते हैं।"

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"Jai Shree Mata Ji"

Tuesday, May 16, 2017

'Impulses"--366--"ध्यान-भेद"

"ध्यान-भेद" 

"अक्सर सहाजियों के बीच एक चर्चा बनी ही रहती है और वो है किसी भी साधक/साधिका के द्वारा सही या गलत ध्यान कराने की। कुछ सहजी ये कहते सुने जा सकते हैं कि अमुक सहजी गलत ध्यान कराता है या अमुक सहजी अच्छा ध्यान कराता है।

कुछ लोग सहजी बहुत जोर देकर कहते हैं कि, 'हमें केवल और केवल "श्री माता जी" के द्वारा बताये गए तरीकों से ही ध्यान करना चाहिए, किसी भी अन्य ध्यानी के द्वारा कराया गया या बताया गया कोई भी तरीका गलत है।'

ध्यान तो केवल "परमपिता परमेश्वर" का ही होता चाहे ध्यान का माध्यम "श्री माँ" हो या "उनका" कोई भी बालक माध्यम बने,भला किसी और का ध्यान कैसे हो सकता है।

समस्त सहजी "श्री माँ" के ही तो यंत्र है, "उन्ही" के द्वारा ही तो उन्नत किये गए है, "उनके" "श्री चरणों" में ही तो सर नवाते हैं, "उन्ही" को तो अपने हृदए में महसूस करते हैं, "उन्ही" का 'सन्देश'' ही तो संसार में फैलाते है, "उन्ही" के 'प्रेम' में डूब कर आनंदित रहते हैं।

यदि हृदए से चिंतन करके देखा जाए तो महसूस होगा कि किसी भी प्रकार का भेद 'ध्यान' में मौजूद नहीं है, यदि कहीं भेद है तो वो है हम सभी की मॉनसिक समझ में। जो कि एक निश्चित स्तर यानि 'हृदए' के स्तर तक विकसित होने से पूर्व बनी ही रहती है।

क्योंकि हम सभी विभिन्न 'पूर्व-परिवेशों' में जन्म लेकर पले-बड़े होते हैं और हमारा मन भिन्न भिन्न संस्कारो से आच्छादित होता हैं।
जिसका प्रभाव हमारी चेतना पर "श्री चरणों" से जुड़ने के वाबजूद भी लंबे समय तक बना ही रहता है।

जिसके कारण हम सभी "श्री माँ" की बताई बातों का अपनी अपनी समझ के मुताबिक ही पालन करते हैं और धीरे धीरे विकसित होते हैं।
ध्यान का तो एकमात्र मतलब ही "प्रभु" का ध्यान है।

हाँ, ध्यान के प्रारंभिक तरीके अलग अलग हो सकते हैं क्योंकि वो तरीके सभी माध्यमों की अपनी अपनी चेतना के स्तर के अनुसार ही होते हैं। और ध्यान में मजा भी अपनी अपनी गहनता के आधार पर ही आता है।

किसी की नाड़ियों व् चक्रों में होने वाली परेशानी भी अपने यंत्र की स्थिति व् दशा के अनुसार ही महसूस होती है । इसका पता लगाने के लिए हमें अपने चित्त को समझना होगा, पूर्ण एकाग्रता के साथ इसका अध्यन करना होगा तभी हम सभी चित्त की बारीकियों को जान पाएंगे।

हमें बड़ी शिद्दत से इसका पीछा करना होगा कि वो यकायक कहाँ चला जाता है, किस सोच में डूब जाता है, किस किस चीज से प्रभावित होता रहता है, ये कहाँ पर अपना अधिकतर समय बिताता है, ये आखिर रहता कहाँ पर है।"

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"Jai Shree Mata Ji"

Saturday, May 13, 2017

"Impulses"--365--"तूलना पीड़ाओं का पुलिंदा"

"तूलना पीड़ाओं का पुलिंदा " 

"अक्सर लोग एक दूसरे की उपलब्धियों व् प्राप्तियों को देख कर स्वम् को निम्न व् हींन समझने लगते हैं और फिर अपनी किस्मत को दोष देना प्रारम्भ कर देते हैं और कभी कभी तो दूसरों की सफलता को देख देख कर भीतर ही भीतर ईर्ष्या भी करने लगते हैं।

परंतु ये समझ नहीं पाते कि सभी मानवों को "परमपिता" उनके पूर्व जीवन के कार्मिक प्रतिफलो व् वर्तमान जीवन में सच्ची लगन, सच्ची श्रद्धा, सच्ची मेहनत व् ईमानदारी के साथ किये गए कार्यों के अनुरूप ही हर चीज प्रदान करते हैं।

जरा चिंतन करके देंखे कि, 

क्या हम वैसा ही जीवन जीते हैं जैसा वो इंसान जी रहा है जिससे हम अपनी तूलना कर रहे हैं ?

क्या वैसे ही हालात में हम रह रहे है जैसा कि उसकी परिस्थितियां हैं ?

क्या हम अपने जीवन को उन्नत करने के लिए उतनी ही मेहनत करते हैं जितना हमारे सामने जो शख्स मौजूद है वो करता है ?

क्या हमारी भी वहीँ प्राथमिकता है जो दूसरे व्यक्ति अपने जीवन में रखता है ?

क्या हमारे भीतर अपने चारों तरफ रहने वाले लोगों के प्रति उतना ही प्रेम व् वात्सल्य है जितना सामने वाले में प्रतीत होता है ?


अतः किसी के भी प्रति नकारात्मक तूलना करने व् ईर्ष्या का भाव रखने से पूर्व निम्न बातों पर शांत भाव से विचार करने से ही अपना स्वम् के जीवन का सत्य हमारे ही सामने उजागर हो जाएगा और हम भीतर में शांति व् संतुष्टि महसूस करेंगे ।"

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"Jai Shree Mata Ji"

Thursday, May 11, 2017

"Impulses'--364--"सदा सनातन भ्रम"

"सदा सनातन भ्रम" 
"पूरे जीवन इंसान अपने बाहरी अस्तित्व (जो एक दिन सुनिश्चित रूप से मिट ही जाएगा,) को आराम दायक हालातों में रखने के लिए प्रयास करता रहता है और अनेको प्रकार के आवश्यक व् अनावश्यक संघर्ष करता रहता है।

आज का अज्ञानी मानव अक्सर प्रकृति के विपरित चला जाता है जिसके कारण वह भीतर व बाह्य स्तर पर बेहद तकलीफ में आता जाता है, पर भीतर की पीड़ा को कम करने के लिए ज्यादातर समय ही नहीं निकालना चाहता ।

कितने आश्चर्य की बात है की मिटने वाली चीजों के लिए आजीवन संघर्ष और जो समस्त प्रकार के संघर्षों में मदद करता है उसके लिए टाइम नहीं है कहकर जीता रहता है।वह हरपल अनेकानेक दुखों का भागी बनता रहता है और अपनी किस्मत को निरंतर कोसता रहता है।


यदि अपने भीतर को कुछ समय दे तो हर तकलीफ में भी कभी कोई तकलीफ महसूस न हो, ये वो चीज होती है जिसमें कभी कोई संघर्ष ही नहीं होता वरन बड़े ही प्रेम से इंसान की सम्हाल होती है ।

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"Jai Shree Mata Ji"